Monday, November 12, 2018

ट्रंप और किम की मोहब्बत में क्या आ गई है दरार?

आपको वो वक़्त याद होगा जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन एक दूसरे के इश्क़ में गिरफ़्तार हो गए थे. लेकिन अब ऐसा लगता है कि वे एक दूसरे से बात तक नहीं करते.

बल्कि लगता तो यूं है कि दोनों देश एक दूसरे को घूरे जा रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं कि सामने वाले का अगला क़दम क्या होगा. दोनों में से कोई हार भी नहीं मान रहा.

दोनों नेताओं के बीच दूसरी मुलाक़ात की भूमिका तैयार करने के लिए इस हफ़्ते जो चर्चा होनी थी, वह भी नहीं हो सकी.

किम के सहयोगी और अतिवादी माने जाने वाले किम योंग-चोल को न्यूयॉर्क आकर अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो से मुलाक़ात करनी थी.

लेकिन बीबीसी को मालूम हुआ है कि जब अमरीकी विदेश मंत्रालय को पता चला कि उत्तर कोरिया से कोई रवाना ही नहीं हुआ है तो उन्होंने बैठक रद्द कर दी.

आधिकारिक संस्करण यही है कि बैठक के लिए नई तारीख़ तय की जाएगी. अमरीकी राष्ट्रपति का कहना है कि चीज़ें जैसी चल रही हैं, वे उससे 'बहुत ख़ुश' हैं और जब तक पाबंदियां लगी हुई हैं वे जल्दी में नहीं हैं.

दक्षिण कोरिया के सिओल में भी पत्रकारों से कहा जा रहा है कि बैठक के मुल्तवी होने के अतिरिक्त अर्थ न निकाले जाएं- क्योंकि अतीत में भी बैठकें टलती रही हैं.

हालांकि दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने 'निराशा' ज़रूर जताई है.

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दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन ने बीबीसी के एक इंटरव्यू में कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय जब उत्तर कोरिया को निरस्त्रीकरण के लिए मनाने की कोशिश कर रहा है तो उन्हें कुछ ऊंच-नीच की भी आशंका है.

लेकिन ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उत्तर कोरिया से बातचीत और लगातार संवाद की गति खोता जा रहा है.

यहां तक कि निचले स्तर पर भी, उत्तर कोरिया में अमरीका के नए राजदूत स्टीफ़न बीगन को पद संभाले दो महीने हो गए हैं और उनकी अब तक अपने उत्तर कोरियाई समकक्ष उपविदेश मंत्री चोई सुन-हुई से मुलाक़ात नहीं हुई है.

इस गतिरोध की जड़ ये है कि उत्तर कोरिया और अमरीका कभी 'निरस्त्रीकरण' के विचार पर पूरी तरह सहमत नहीं हुए.

जब वे निरस्त्रीकरण की बात करते हैं तो उसका मतलब क्या है?

यह सही है कि दोनों नेताओं के बीच सिंगापुर में एक समझौते पर दस्तख़त किए गए थे, लेकिन उस समझौते के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है. यही अधूरी जानकारी अब इस पूरी प्रक्रिया को बाधित कर रही है.

शुरू से ही उत्तर कोरिया का रुख़ साफ़ था. वे एकतरफ़ा निरस्त्रीकरण नहीं करेंगे. वे उसके बदले में कुछ चाहेंगे. इसका मतलब है कि इस वक़्त उन्हें लगता है कि प्रतिबंधों से फ़ौरी राहत पाने के लिए उसके क़दम पर्याप्त हैं.

अमरीका और संयुक्त राष्ट्र दोनों ने उत्तर कोरिया पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं.

उत्तर कोरिया के क़रीब 90 फ़ीसदी निर्यात पर प्रतिबंध है, जिसमें कोयला, लौह अयस्क, सी फ़ूड और कपड़ा वगैरह है. उसके तेल ख़रीदने की भी सीमा तय है. अगर किम जोंग-उन अपने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना चाहते हैं और ऐसा वादा उन्होंने अपने देशवासियों से किया है तो वे इन पाबंदियों से निजात ज़रूर चाहेंगे.

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